मार्च के बाद हुए बदलावों को जानें, जिंदगी में उन आदतों को अपनाएं जो कॉर्पोरेट के नए नियमों के मुताबिक हों

Management Funda By N. Raghuraman

कोरोना की वजह से लंबे समय तक सबकुछ रुके रहने के बाद अब देश में धीरे-धीरे कई गतिविधियां शुरू हो रही हैं। मेरे कुछ छात्रों को इस मंगलवार इंटर्नशिप के लिए कॉल आए। वे दीवाली की छुटि्टयों के बाद दो महीनों के लिए चुनिंदा कंपनियों में काम करेंगे। अगर वे उस दौरान अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो संभावना है कि मार्च 2021 में अकादमिक सत्र खत्म होने पर उन्हें वहीं स्थायी नौकरी मिल जाए।

तीन महीने पहले, जबसे उनके साथ ऑनलाइन क्लास और काउंसलिंग शुरू की है, मैंने सबसे बड़ी कमी यह महसूस की, कि उनमें से किसी ने भी एक बार भी कैमरा चालू नहीं रखा। मैं जानता हूं कि उनका ड्रेस सेंस कैजुअल था, वे निजी आदतें भुला चुके थे और मुझे रोजमर्रा के कामों में अनुशासन के बारे में पूछना भी नहीं चाहिए। उनमें से ज्यादातर अपना कम्प्यूटर पर म्यूट रखते थे और कुछ खाते रहते थे, जो मैं नहीं देख सकता था। कभी-कभी उनके चबाने की आवाज से शोर होता तो कभी उनकी अपने भाई-बहनों या माता-पिता से कहासुनी भी होती। आप सोच रहे होंगे कि यह मुझे कैसे पता? आइडिया बहुत आसान है। जिसके ऑनलाइन शिष्टाचार पर आपको संदेह है, उससे चालाकी से अचानक कोई सवाल पूछ लें। स्क्रीन पर अच्छी नजर रखने वाला आसानी से उनके जवाब देने के लहजे और तरीके से उनकी स्थिति समझ सकता है।

इसीलिए, मैंने सुझाव दिया कि उनके कॉलेज को पर्सनालिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित करना चाहिए क्योंकि उनका बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह खत्म हो गया है और लॉकडाउन के बाद से कॉर्पोरेट भारत पूरी तरह बदल चुका है। मैं अंदर से जानता हूं कि अगर वे इस बदले हुए कॉर्पोरेट माहौल में बिना किसी तैयारी के कूदेंगे, तो वे पानी से बाहर निकली मछली जैसा महसूस करेंगे।

इससे मुझे 22 वर्षीय सौरव चक्रवर्ती का हाल ही में हुआ अनुभव याद आया। वह बचपन से पुलिसवाला बनना चाहता था। उसने परीक्षाएं दीं, क्योंकि उसे इनके बारे में पता था। उसे फिजिकल फिटनेस की जरूरत भी पता थी, जो उसने समय के साथ पा ली। लेकिन उसे इंटरव्यू निकालने के बारे में नहीं पता था। तभी उसे पता चला कि कूच बिहार, बंगाल के उप पुलिस अधीक्षक (ट्रैफिक) चंदन दास कुछ युवाओं को इंटरव्यू के लिए तैयार कर रहे हैं। सौरव भी उनसे जुड़ गया और अब उनके मार्गदर्शन की वजह से उसका सपना सच हो गया है। सौरव के अलावा चंदन दास के 70 में से 55 तथाकथित ‘छात्र’ बंगाल राज्य पुलिस बल में कॉन्सटेबल पद के इंटरव्यू में सफल रहे।

पिछले शुक्रवार दास को अपने कई छात्रों को ऑफिस के बाहर देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने दास का गुलदस्ता, केक और चॉकलेट देकर सम्मान किया। जब छात्रों ने दास को बताया कि वे इंटरव्यू में सफल रहे और अब वे सिपाही बनेंगे, तो दास का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

दास ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया, पढ़ने की आदत को दिशा दी और उन्हें बताया कि सवाल को पहले कैसे समझें, फिर उसपर सोचें और जवाब दें। आमने-सामने के मॉक इंटरव्यू का फायदा यह हुआ कि छात्रों ने पैनल के सामने सख्ती के साथ जाने और जब तक बैठने को न कहा जाए, खड़े रहने जैसी कई बॉडी लैंग्वेज संबंधी चीजें सीखीं। दास को इसलिए भी अच्छा लगा क्योंकि ये ज्यादातर लड़के कमजोर पृष्ठभूमि से थे।

मेरा सुझाव है कि अगर आप युवा है, कॉर्पोरेट दुनिया में प्रवेश का प्रयास कर रहे हैं, वह भी वायरस के हमले के बीच, तो पूर्वाभ्यास करें, इस साल मार्च के बाद हुए बदलावों को जानें, जिंदगी में उन आदतों को अपनाएं जो कॉर्पोरेट के नए नियमों के मुताबिक हों।

फंडा यह है कि जैसे छेनी लकड़ी काटकर उसे आकार देती है, आपको भी वे ‘फैट’ (पढ़ें आदतें) हटाने होंगे, जो नए कॉर्पोरेट के लिए ठीक नहीं हैं।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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