सपनों को सच करने के लिए हमें मालूम होना चाहिए कि कब टकराना है, कब पीछे हटना या आगे जाना है

किसी को भी यह पता होना चाहिए कि कब कदम आगे बढ़ाना है और कब पीछे खींचना है। यह भी जानना जरूरी है कि कब टक्कर मारनी है और कब किसी के लिए खड़े होना है। अगर आप इनमें से कुछ भी नहीं जानते हैं तो आप गरबा नहीं कर सकते, डांडिया नहीं खेल सकते। ऐसा मेरे एक मैनेजमेंट प्रोफेसर ने कई साल पहले नवरात्रि के दौरान कहा था। मुझे यह बात तब याद आई, जब मुझे कुछ गरीब बच्चों के बारे में पता चला, जिन्होंने अ‌वसरों को सही तरीके से पकड़ा, जबकि उनके माता-पिता उनके लिए खड़े हुए, पंचायतें पीछे हटीं, ग्रामीण मदद के लिए आगे आए, ताकि ये बच्चे अपने सपने सच कर सकें।


पहली कहानी: एक पानवाले की बेटी लक्ष्मी शिवासली उस जगह की रहने वाली है जिसे ‘सांपों का बसेरा’ कहते हैं। लेकिन इसने उसे इस साल सरकारी मेडीकल कॉलेज में सीट पाने के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी एंड एंट्रेस टेस्ट (नीट) में देश में 1,811वीं रैंक हासिल करने से नहीं रोका। वह कर्नाटक के छोटे से शहर हावेरी से है, जहां बेंगलुरु से ट्रेन द्वारा जाने पर 7 घंटे लगते हैं। हावेरी नाम कन्नड भाषा के हावु और केरी से बना है, जिनका अर्थ है सांपों का बसेरा। यह जगह इलायची और लाल मिर्च के लिए भी जानी जाती है। लक्ष्मी ने पिछले साल भी 55,212 रैंक हासिल की थी लेकिन वह प्राइवेट कॉलेज की फीस नहीं दे सकती थी। सिर्फ लक्ष्मी का ही नहीं, बल्कि तेलंगाना में 190 निर्धन परिवारों के बच्चे का भी डॉक्टर बनने का सफर शुरू हुआ है। ज्यादातर के माता-पिता चाय बेचने वाले, मैकेनिक, घरेलू काम करने वाले और कृषि मजदूर या ऐसे ही छोटे-मोटे काम करने वाले हैं। जी. अभिलाष ने भी एससी श्रेणी में 168वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल की है। परीक्षा से कुछ दिन पहले उसे कोरोना हो गया था। उसे निराश हुए बिना पीछे हटकर खुद को 14 दिन के लिए आइसोलेट करना पड़ा।
दूसरी कहानी: पिछले चार दिनों से मेरी मोबाइल सर्विस नहीं चल रही। ऑनलाइन पढ़ना तो छोड़िए, मैं यह कॉलम तक नहीं भेज पा रहा था। आप समझ सकते हैं कि 24/7 ऑनलाइन रहने वाले व्यक्ति की क्या स्थिति होगी। अब मैं रोज अपने पढ़ाई वाले कमरे, बगीचे, छत तथा बालकनियों के बीच बंदरों की तरह उछलता रहता हूं क्योंकि नए सर्विस प्रोवाइडर का हमारे इलाके में नेटवर्क कमजोर है।


इन चार दिनों में मुझे महसूस हुआ कि ग्रमीण क्षेत्रों के हर छात्र को ऑनलाइन क्लास में शामिल होना कितना मुश्किल हो रहा होगा। शायद यही कारण है कि गोवा के कानाकोना और सैनगुएम जैसे दूरदराज के कई गांवो में अब लकड़ी की कई अस्थायी संरचनाएं देख सकते हैं, जिन्हें ‘माल्लो’ (मचान) कहते हैं। ये ज्यादातर जंगलों के अंदर या पहाड़ियों पर हैं। गांव के पंचायत अधिकारी परेशान होकर पीछे हट गए, जब उन्हें नेटवर्क की समस्या और बच्चों के पढ़ाने के वैकल्पिक तरीके अपनाने को लेकर अधिकारियों से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। गोवा के कई गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी न के बराबर है। लेकिन गांव वालों ने हार नहीं मानी। चूंकि महामारी की वजह से क्लास ऑनलाइन हो रही हैं, इसलिए माता-पिता ‘माल्लो’ बनाकर बच्चों की मदद कर रहे हैं, ताकि बच्चे किसी भी मौसम का सामना कर, जरा-सा भी नेटवर्क मिलने पर अपने सिलेबस के साथ चल सकें।


फंडा यह है कि जैसा कि डांडिया और गरबा में होता है, वैसे ही सपनों को सच करने के लिए हमें मालूम होना चाहिए कि कब टकराना है, कब पीछे हटना या आगे जाना है और कब अपने लिए खड़े होना है।


एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply