काम के हर क्षेत्र में सुधार करते हुए किसी भी लक्ष्य को पाते हैं, लेकिन इतना तय है कि हम में से कई लोग ‘डिजिटल डाइट’ को 2021 के लिए अपना लक्ष्य बनाएंगे

Management Funda by N. Raghuraman

हमेशा प्रेरित कैसे बने रहें? मैंने इस सवाल का सामना कई बार किया है। मेरे सार्वजनिक संबोधन या प्रशिक्षण कार्यक्रम में कोई न कोई खड़ा होगा और पूछेगा, ‘सर, मैं आपकी बात समझ गया और अभी बहुत प्रेरित महसूस कर रहा हूं। लेकिन मेरी समस्या यह है कि आपको या आपके जैसे किसी व्यक्ति को सुनने के तीन दिन बाद मैं फिर बोरियत की ओर लौट जाऊंगा और कुछ भी करने की प्रेरणा खत्म हो जाएगी। मैं इससे कैसे बचूं?’ अगर आप भी ऐसा महसूस करते हैं तो आगे पढ़ें।

यह आज के समय की सबसे प्रेरक कहानी है। वह एक भिखारी थी। यह आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि किसी भी देश में ज्यादातर ट्रांसजेंडर भीख मांगने मजबूर हो जाते हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर निशा राव के सफर ने दुनिया को चौंका दिया, जो 18 वर्ष की उम्र में दस साल पहले घर से भाग गई थी। निशा ट्रैफिक लाइट पर भीख मांगती थी लेकिन धीरे-धीरे उसने रात की लॉ क्लासेस की फीस देना शुरू किया।

कई वर्षों बाद उसे कानून की डिग्री मिली, इस साल उसे लॉ लाइसेंस मिला और वह कराची बार एसोसिएशन से जुड़ गई। इस तरह वह पाकिस्तान की पहली ट्रांसजेंडर वकील बनी। वह 50 केस लड़ चुकी है और ट्रांसजेंडर के अधिकारों के लिए लड़ रहे एक गैर-सरकारी संस्थान संग काम कर रही है। उसके जीवन का उद्देश्य पाकिस्तान की पहली ट्रांसजेंडर जज बनना है। हम नहीं जानते कि क्या वह वो बन पाएगी, जो बनना चाहती है, क्या उसके देश का कानून उसका लक्ष्य आसान बनाएगा या नहीं, लेकिन जरूरी यह है कि उसने अपने लक्ष्य के रास्ते पर चलने का फैसला लिया है।

निशा की कहानी हमें सिखाती है कि वह जो पहले करती थी, उसकी तुलना में उसने अत्यंत सुधार किया। याद रखें, उसे वहां पहुंचने में 10 साल लगे, जहां वह आज है। स्वाभाविक है कि, लगातार सुधार जीवन जीने का तरीका है, जिसे विकसित करने और बेहतर बनाने की जरूरत है।

हालांकि ज्यादातर लोग यह जानते थे और ऐसा कर रहे थे, लेकिन लॉकडाउन ने हमारे अनुशासन को पटरी से उतार दिया। कई लोगों, खासतौर पर युवाओं के लिए उनका औसत मोबाइल स्क्रीन टाइम दो अंकों में पहुंच चुका है, जिसका मतलब है कि उनमें हर कोई मोबाइल पर 10 घंटे से ज्यादा बिता रहा है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ। मुझे अहसास हुआ कि मैं दिनभर मोबाइल स्क्रीन के सामने रहता हूं। मैं स्क्रीन के सामने खाना खाता था। और मैं उन जगहों पर भी अपने कान और मुंह इस्तेमाल कर रहा था, जहां काम के लिए मेरा दिमाग, उंगलियां और आंखें पर्याप्त थीं।

मैंने कार्यशैली में पहला बदलाव यह किया कि ऑफिस के सारे काम लैपटॉप पर करने लगा और ऑफिस के समय के बाद वॉट्सएप के जवाब देने के अलावा सिर्फ व्यक्तिगत काम मोबाइल पर करने लगा। चूंकि मेरा वॉट्सएप लैपटॉप से लिंक है, इसलिए सभी ऑफिशियल वॉट्सएप के जवाब मैं बड़ी स्क्रीन पर देता हूं, मोबाइल फोन छुए बिना।

इस तरह, 6 महीने की मेहनत के बाद, मई 2020 के सात घंटे मोबाइल स्क्रीन टाइम से, आज मैं रोजाना तीन घंटे के औसत पर आ गया हूं। जहां मेरा मोबाइल संवाद कम हुआ है, जो मुझे उन लोगों से मिलवाता था, जिन्हें मैं नहीं जानता, वहीं अब मुझे उन लोगों से ज्यादा बात करने का मौका मिल रहा है, जिन्हें मैं जानता हूं, प्यार करता हूं, पसंद करता हूं। मैंने 2021 के लिए दो घंटे का लक्ष्य रखा है। और मैं जानता हूं एक घंटा कम करने में 6 महीने और लगेंगे।

फंडा यह है कि काम के हर क्षेत्र में सुधार करते हुए किसी भी लक्ष्य को पाते हैं, तो हम हमेशा प्रेरित रहते हैं, लेकिन इतना तय है कि हम में से कई लोग ‘डिजिटल डाइट’ को 2021 के लिए अपना लक्ष्य बनाएंगे।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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