बड़े शहर वो नहीं सिखा पाते, जो फावड़ा उठाने वाले किसान सिखाते हैं

Management Funda by N. Raghuraman

बुजुर्गों की हेल्पलाइन (1090) के परामर्शदाताओं के मुताबिक, मार्च से नवंबर 2020 के बीच उन्हें 209 आपात फोन आए, जिसमें बुजुर्गों के साथ शारीरिक और मौखिक हिंसा की शिकायतें आईं। केवल बेंगलुरू में ही बुजुर्गों को अकेला छोड़ देने के 40 मामले आए, जहां सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे आईटी पेशेवर रहते हैं। ये सिर्फ दर्ज मामले हैं और उनका कहना है कि ऐसे और मामले हो सकते हैं। इससे मुझे पिछले हफ्ते पुणे के पास घटी एक घटना याद आई, जब एक ऑटो ड्राइवर ने दावा किया कि उसके पास अपने बुजुर्ग मां-बाप को किस्मत के भरोसे मंदिर में छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। फिर वहां मौजूद जागरूक लोगों के हस्तक्षेप के बाद पूरा परिवार साथ घर गया।

लेकिन उनपर दया की बारिश भी हुई। पास की ही कम्यूनिटी ने उन्हें एक साल का राशन दिया और ऑटो वाले की कर्ज की मासिक किश्तें चुकानें का भी वादा किया। मैं और ऐसे दु:खद उदाहरण नहीं देना चाहता। ऐसे मामले अन्य बड़े शहरों में भी होते होंगे, जिनके बारे में हमें पता नहीं होता। कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से कई परिवारों में नौकरियां जाने और वेतन घटने से हुए अभाव, कम से कम बड़े शहरों में तो बुजर्गों के साथ दुर्व्यवहार का मुख्य कारण रहे हैं। आइए, मैं आपको नेशनल हाइवे 44 पर स्थित सिंघु बॉर्डर ले चलूं, जो देश की राजधानी दिल्ली से जुड़ती है। यह किसान आंदोलन का केंद्र है, जहां मंगलवार को पहुंचने के बाद मैंने पहले 24 घंटों में हजारों लोगों को पहुंचते देखा। वे चप्पलें, कीचड़ में सने जूते और विभिन्न तरह के गर्म कपड़े पहनकर पहुंचे थे। उसमें बहुत अमीर या गरीब न सही, लेकिन अच्छी-खासी हैसियत वाले लोग थे।

इन दिनों मैं अपना पूरा दिन इस हाइवे पर बिता रहा हूं और हजारों किसानों, कामगारों, भूमिहीनों, भूमि मालिकों, ‘सेवाकर्मियों’, स्वयंसेवकों को देख रहा हूं और उनसे मिलकर, बातें कर उनकी जिंदगी समझने की कोशिश कर रहा हूं। और पहले दिन से ही जो चीज मुझे असाधारण लगी, वह थी ‘बुजर्गों की देखभाल’, खासतौर पर यह दृश्य देखने के बाद। एक वज़नी सरदारजी जमीन पर बैठे थे। और मेरे दायीं ओर एक बेटा और पिता बैठे थे। मैं उनके बीच खड़ा था। वज़नी सरदारजी ने दूसरे सरदारजी के युवा बेटे को आवाज दी और उससे पानी की कुछ बोतलें लाने को कहा। लड़के को उठने में एक पल भी नहीं लगा। वह इंसानी समुद्र चीरते हुए ऐसी सहजता से सड़क पार कर गया, जैसे मक्खन में से चाकू गुजरता है।

वह उस स्टेज की तरफ दौड़ा जहां मोर्चा चल रहा था। एक-दो मिनट में ही वह बोतल लेकर आ गया और बुजुर्ग को दे दी। जब लड़का फिर बैठा, पिता उसे देख मुस्कुराया। उनके बीच कोई मौखिक संवाद नहीं हुआ, न ही ‘धन्यवाद’ कहा गया। बस आंखों-आंखों में बात हो गई।

यकीन मानिए, मैं शहर में रहता हूं और अगर यह घटना वहां हुई होती, तो मुझे 100% भरोसा है कि पिता ने बेटे को बैठे रहने को कहा होता और खुद बुजुर्ग सरदारजी के लिए पानी लेने गया होता। ऐसा मुख्यत: इसलिए क्योंकि बतौर पिता, उसे चिंता होती कि उसका बेटा अनियंत्रित भीड़ में खो न जाए। जब मैंने यह डर उस किसान को बताया तो वह मुस्कुराया और बोला, ‘बुजुर्गों की मदद करने वाले बच्चे खोते नहीं हैं।’ आंदोलन में युवाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति और न सिर्फ आवश्यक सामग्री प्रदान करने, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों को आंदोलन के दौरान दिन-रात सुरक्षा प्रदान करने का ‘सेवा भाव’ सभी नए पैरेंट्स और उनके भाई-बहनों के लिए सबक है।

फंडा यह है कि कम्प्यूटर माउस पकड़ने वाले पैरेंट्स की तुलना में फावड़ा उठाने वाले किसान से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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