सीखने के लिए कभी भी देर नहीं होती, जिससे आप डरते हैं, उसके साथ प्रयोग कीजिए और बदलाव महसूस कीजिए

इस बुधवार को जब गोवा के पर्यटन मंत्री मनोहर अजगांवकर ने कहा कि उनके राज्य का पर्यटन क्षेत्र कोविड का टीका बाजार में आने के बाद ही गति पकड़ेगा, तो कई छोटे व्यापारी इससे खुश नहीं थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें से अधिकांश ने कभी भी स्थानीय और घरेलू पर्यटकों की ओर ध्यान नहीं दिया और उनका बिजनेस मुख्यरूप से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों से ही फला-फूला, जो कि वैसे भी कम है। एक बिजनेसमैन ने मुझसे कहा कि ‘इस बिजनेस में स्थानीय और फिर घरेलू पर्यटकों को लुभाने की ट्रिक सीखने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है।’ और मैंने कहा कि ‘कुछ भी सीखने के लिए कभी भी देर नहीं होती।’

और मुझे चंडीगढ़ की 94 वर्षीय हरभजन कौर की स्टोरी याद है, जो 2020 की शुरुआत में मैंने पढ़ी थी। अपनी पीढ़ी की अन्य मांओं की तरह वह भी अपने परिवार के हर सदस्य के लिए बिना थके खाना बनाती आ रही हैं। 4 साल पहले जब वह 90 की थीं, तो उनकी बेटी रवीना सूरी ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज का अफसोस है? तब उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि ‘भरपूर जीवन जीने के बावजूद खुद की दम पर पैसा ना कमा पाने का उन्हें बुरा लगता है।’

अपनी मां के इस पछतावे को दूर करने के लिए रवीना ने उन्हें एक उद्यमी वेंचर शुरू करने के लिए प्यार से उकसाया, यह स्वादिष्ट चीजें बनाने के बारे में था, जिनके साथ घर का हर सदस्य बड़ा हुआ था। और तब ‘बचपन याद आ जाएगा’ टैगलाइन के साथ ‘बेसन की बर्फी’ स्टार्टअप शुरू हुआ।

ऐसा नहीं है कि मैं चंडीगढ़ के न्यूज़पेपर पढ़ता हूं इसलिए मैंने उनकी स्टोरी पढ़ी बल्कि महिंद्रा एंड महिंद्रा के प्रमुख आनंद महिंद्रा के ट्वीट से मेरा ध्यान उस स्टोरी की ओर गया। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘जब आप स्टार्ट-अप शब्द सुनते हैं, तो मन में सिलिकॉन वैली या बेंगलुरु में कई लाख करोड़ के यूनिकॉर्न बनने की ओर अग्रसर मिलेनियल की छवि आती है। अबसे 94 साल की महिला को भी इसमें शामिल करें, जो यह नहीं सोचतीं कि स्टार्ट-अप शुरू करने के लिए बहुत देर हो चुकी है। वह मेरी आंत्रप्रेन्योर ऑफ द ईयर हैं।’

दिलचस्प बात है कि हरभजन शर्मीली गृहिणी थीं, वह अपने घर-परिवार से बमुश्किल ही बाहर निकली थीं। पर एक दिन उन्होंने सबसे पहले खुद के बूते स्थानीय सब्जी बाजार में दुकान लगाई, वहां बैठीं, ग्राहकों से बातचीत की और दो हजार रुपए के साथ घर आईं, जो कि उनकी पहली खुद की कमाई थी। उस कमाई ने उनका आत्मवि‌श्वास बढ़ाया और बिजनेस भी, जिसमें उन्होंने कई चीजों के साथ बर्फी, चटनी और अचार भी रखना शुरू किए। वह इस बात में भरोसा रखती हैं कि बेकार बैठने से अच्छा है कि बाहर निकलकर कुछ काम किया जाए!

अब यह परिवार सितंबर के अंत तक होम स्टोर खोल रहा है, जहां घर के सभी सदस्यों के हाथ से बनाए उत्पाद रखे जाएंगे। हरभजन पैसों के लिए नहीं, सब जगह से मिल रही प्रशंसा व प्रेम के लिए काम कर रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इस बुधवार को अपने नाम से एक कुरिअर पाकर वह बहुत खुश हुईं, जो उनके लिए आम नहीं था।

इसमें एक शॉल के साथ बेंगलुरु से उनके ग्राहक का भेजा थैंक्यू नोट भी था, जिस पर लिखा था- ‘बर्फी, चटनी और प्रेरणाओं के लिए धन्यवाद!’ अब मेरा सवाल है कि अगर 94 साल की महिला वह कर सकती है, जो उसने पूरी जिंदगी नहीं किया, तो कोविड से प्रभावित व्यापारियों को ग्राहकों व उनकी जरूरतें पूरा करने के लिए नई रणनीति बनाने से क्या रोक रहा है?

फंडा यह है कि जिससे आप डरते हैं, उसके साथ प्रयोग करने का जिंदगी अवसर देती है, उम्र कोई भी हो उसे भुनाइए और बदलाव महसूस कीजिए।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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