खुद में बेहतरी के लिए बदलाव लाना चाहते हैं तो अपने लिए कष्ट और आनंद के मायने बदलकर देखिए

दर्द और आनंद जिंदगी नाम के सिक्के के दो पहलू हैं 

अब हम अपने व्यवहार को बहुत परिपक्वता के साथ देखना शुरू करते हैं, हमें महसूस होता है कि हमारे और हमारे बारे में कई पहलुओं में भारी बदलाव की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि हम बदलना नहीं चाहते, लेकिन इन बदलावों को लाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह ज्ञान मुझे गुरुवार सुबह रुकमणि रामचंद्रन से मिला। वे उन कई केंद्रीय कर्मचारियों में से एक हैं, जिन्हें मैं अपने 42 साल की पेशेवर जिंदगी में जानता हूं, जो अपने काम को ‘सेवा’ मानते हैं। और संयोग से उनके विभाग का नाम भी ‘साई’ यानी सुप्रीम ऑडिट इंस्टिट्यूशन है जो सरकारी विभागों का ऑटिड करता है। उन जैसे लोगों की वजह से ही कोई सरकार ‘सुशासन’ का गौरव पाती है। इसलिए मुझे वे जो भी भेजती हैं, उसे मैं गंभीरता से पढ़ता हूं क्योंकि वह सोचने पर मजबूर करता है।

मैं जब वह पढ़ रहा था, तब मेरी कार गुरुवार की सुबह 6.05 पर इंदौर के नजदीक पीथमपुर इंडस्ट्रीयल बेल्ट से गुजरी। मैं खुली खिड़कियों से सुबह की बयार का आनंद ले रहा था। अचानक कई इंसानों की बातों ने मुझे डिस्टर्ब किया और जब मैंने नजरें उठाई तो देखा कि सैकड़ों युवा और अधेड़ सुबह का व्यायाम कर रहे थे, तो कुछ हाइवे के किनारे जॉगिंग कर रहे थे। ज्यादातर युवा वाकई में एक्सरसाइज को लेकर गंभीर थे और उनकी टीशर्ट पीछे से भीग चुकी थी।

‘नमस्ते’ की मुद्रा

अगली जगह मानपुर थी, जहां मैंने देखा कि कुछ लोग सड़क के डिवाइडर पर ‘नमस्ते’ की मुद्रा में खड़े होकर सूर्योदय का इंतजार कर रहे थे। उस शहर की पूर्वी तरफ पहाड़ियों से ढंकी थी। अगर उनपर बादल हों तो सूरज को निकलने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है। इसलिए कुछ बुजुर्ग थोड़ा कष्ट उठाते हुए रोड के डिवाइडर पर इंतजार करते हैं कि सूर्य का अभिवादन करें, फिर अपनी मॉर्निंग वॉक शुरू करें।

फिर मैं जैसे-जैसे गांवों और शहरों से गुजरा, मैंने देखा कि लोग और कम सक्रिय होते जा रहे थे और उनके काम की गति धीमी हो रही थी। सड़क किनारे के ढाबे या तो खुले थे या खुल रहे थे। लेकिन हर गांव झाड़ लगाने और पानी छिड़कने तथा यात्रियों के लिए तैयार होने में पिछले गाँव से पीछे चल रहा था। जब मैं सुबह 9 बजे मालेगांव पहुंचा तो कुछ लोगों को खटिया पर बैठे देखा, जो गुजरने वालों को ऐसे देख रहे थे जैसे वे खुद पर्यटक हों और रोड पर हमारी प्रदर्शनी लगी हो। 

मप्र के पीथमपुर से महाराष्ट्र के मालेगांव के बीच मैंने एक अजीब चीज देखी। पीथमपुर की तुलना में मालेगांव में तोंद ज्यादा बड़ी थीं। ऐसा नहीं था कि वे बीमार थे लेकिन सूर्योदय पर पसीना बहाने वाले गांवों के लोगों की तुलना में कम सक्रिय गांव के लोग जरा मोटे थे। फिर मैंने देखा कि यह मोटापा इस आधार पर बदल रहा था कि कौन-सा गांव/शहर सूर्योदय के दौरान कितना सक्रिय रहता है।

यह बात जब मैंने ब्रेक के दौरान एक स्थानीय से साझा की तो उसने कहा कि सभी बदलना चाहते हैं लेकिन ज्यादातर ऐसा नहीं कर पाते, जिससे धीरे-धीरे अक्षमता पनपती है। इससे हताशा जारी रहती है, चूंकि हम मंशा के स्तर पर तो बदलने में सक्षम हैं लेकिन उसे अपने कार्यों में लागू नहीं कर पाते। जब सोना और सुस्ती आनंद है तथा जॉगिंग दर्द, तो सिर्फ इच्छा करना बदलाव नहीं लाएगा क्योंकि दर्द और आनंद एक ही सिक्के (पढ़ें जिंदगी) के दो पहलू हैं। 

फंडा यह है कि खुद में बेहतरी के लिए बदलाव लाना चाहते हैं तो अपने लिए कष्ट और आनंद के मायने बदलकर देखिए।

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