आत्मनिर्भर भारत के लिए हर घर में ‘फूड गुरु’ की जरूरत है, जो कि अपनी आमदनी से रोज के खाने पर बहुत ज्यादा खर्च ना करे, फिर भी स्वास्थ्यवर्धक खाना खाए

Management Funda by N. Raghuraman

एक ओर सिंगालीला नेशनल पार्क के मुहाने पर बसे दो गांव गोरखे और समंदेन के 200 लोग हैं, जहां पहुंचने के लिए अभी भी कोई सड़क मार्ग नहीं है और दार्जीलिंग से तीन घंटे ड्राइव करके रम्मन पॉइंट और फिर वहां से दो घंटे ट्रेकिंग करने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। इन गांवों में आज भी यातायात का प्रचलित साधन घोड़े और खच्चर ही हैं। इन दो गांवों के 66 परिवारों में हर कोई या तो किसान है या इन ट्रेकिंग रास्ते पर गाइड है।

आश्चर्यजनक है कि दार्जीलिंग में देश का पहला हाइडल प्रोजेक्ट शुरू होने के 123 सालों बाद इस शनिवार को पहली बार ये दो गांव ‘पूर्ण विद्युतीकरण’ के दायरे में आए। वहीं दूसरी ओर हम हैं, जो हवाई जहाज से उतरते हैं और एयरपोर्ट से बाहर आने से पहले ही हमारी खुद की गाड़ी या रेंटल कार बाहर हमारा इंतज़ार कर रही होती है। हम 60% व्यापार फोन के जरिए करते हैं और 200 किमी की यात्रा तीन घंटे से थोड़े से ज्यादा समय में पूरी कर लेते हैं। और हमारे लगातार इस्तेमाल में आने वाले कई गैजेट्स में से एक ना एक हमेशा चार्जिंग पॉइंट पर लगा रहता है, क्योंकि हम नसीब वाले हैं जो हमारे चारों ओर यहां तक कि कार में भी चार्जिंग पॉइंट है।

इस विरोधाभास के बावजूद इन दो तरह के लोगों में दोनों अपनी रोज़ाना की आमदनी का 3.5% हिस्सा खाने की प्लेट पर खर्च करते हैं। वहीं न्यूयॉर्क निवासी 0.6% खर्च करता है। इस शुक्रवार को यूएन के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा जारी ‘कॉस्ट ऑफ ए प्लेट ऑफ फूड’ रिपोर्ट में यह बताया गया, ‌जिसे वर्ल्ड फूड डे (डब्ल्यूएफडी) के रूप में मनाया गया। सूची में शामिल दुनिया के 36 देशों में भारत अपनी आमदनी की तुलना में खाने की प्लेट पर खर्च करने वाले लोगोंं में 28वें क्रम पर है। यह रिपोर्ट सुदूर इलाकों में सीमित आय के साथ रहने वाले और संपन्नशाली दुनिया में रहने वाले लोगों के बीच भारी असमानताओं को सामने लाती है।

रिपोर्ट में स्वीकारा है कि अब कोविड ने इन चुनौतियों का सामना करने वाले अधिकांश लोगों के सामने एक और मुश्किल बढ़ा दी है। डब्ल्यूएफडी हर साल नई थीम के साथ मनाया जाता है, इस साल की थीम है- ‘पोषण, टिकाऊ विकास, बढ़त, सबमिलकर।’ और यहां मैं हर किसी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। हम भारतीय पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक पोषक तत्वों के बजाय कृत्रिम पोषक तत्वों पर ज्यादा निर्भर होते हैं। चूंकि ये कृत्रिम पोषकतत्व सुविधानजक दामों पर मिल जाते हैं (सिक्कों के रूप में पांच-दस रुपए को भी हम चिल्लर मानते हैं) यहां तक कि ग्रामीण भी इसका बड़ी संख्या में उपभोग करते हैं। खाने के पैकट पर लगे लेबल पढ़ना अभी भी हमारी आदत में नहीं आया है। जब हम यह करना शुरू कर देंगे, तो पता चलेगा कि बच्चों को क्या खिला रहे हैं। कृत्रिम खाद्य की तुलना में प्राकृतिक खाद्यों को शरीर बेहतर तरीके से ग्रहण करता है।

संयोग से कोविड ने हमें इस ओर फिर से देखने का अवसर दिया कि हम क्या खाते हैं। जब रेस्तरां बंद थे, तो हमारे किचन और किचन गार्डन के साथ-साथ हमारा फोन भी रेसिपी व इसकी सामग्री शेयर करने में व्यस्त थे। हमें कम से कम ये तो पता चला कि गोलियों के बजाय स्थानीय या खुद से उगाए खाद्य से शरीर की कमियों को दूर किया जा सकता है। किचन गार्डन चलन बन गया। अचानक हमारी मांएं-पत्नियां पुराने खानपान से जुड़े ज्ञान को सामने लाईं और जितना वह कर सकती हैं, प्रति प्लेट कीमत को कम से कम करने का प्रयास कर रही हैं।

फंडा यह है कि आत्मनिर्भर भारत के लिए हर घर में ‘फूड गुरु’ की जरूरत है, जो कि अपनी आमदनी से रोज के खाने पर बहुत ज्यादा खर्च ना करे, फिर भी स्वास्थ्यवर्धक खाना खाए।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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