जो चीज जरूरत से ज्यादा है, उसे किसी को देने की ‘गांधीवाद’ सीख हमारे बच्चों को आज सिखाने की जरूरत

Management Funda By N.Raghuraman

तीन साल पहले जब मैं अपने नासिक वाले घर पर था, मैंने अपनी छत से एक दृश्य देखा, जहां एक बच्ची, जिसने अभी-अभी चलना सीखा था, अपनी मां के साथ मेरे घर के सामने से गुजर रही थी। वह आगे जाकर एक घर के सामने रुकी, जिसके आंगन का गुलाब उसे आकर्षित कर रहा था। चूंकि वह गुलाब चाहती थी इसलिए मां ने तोड़कर उसे दे दिया। फिर बच्ची मां की गोद में बैठकर गुलाब बार-बार गिराने लगी।

मां हर बार धैर्यपूर्वक फूल उठाती, लेकिन बच्ची के घर पहुंचते-पहुंचते गुलाब में एक भी पंखुड़ी नहीं बची। इस दृश्य को देखते हुए छत पर व्यायाम कर रहे उस घर के मालिक ने मेरी ओर देखा। जैसे कह रहे हों, ‘ऐसे पैरेंट्स और उनकी पैरेंटिंग के बारे में क्या कहें’। शाम को जब हम सड़क पर मिले तो उन्होंने कहा, ‘अगर मैंने उस मां से कहा होता कि फूल तोड़ने के लिए मालिक की अनुमति लो तो वह बुरा मान जाती और शायद कहती कि मेरा दिल इतना छोटा है कि 14-15 महीने के बच्चे के लिए एक फूल नहीं दे सकता।’

पिछले हफ्ते मैं फिर नासिक गया, लॉकडाउन के बाद पहली बार। और कल मैंने उसी बच्ची को देखा जो अब थोड़ी बड़ी हो गई थी और कई आंगनों की दीवारों पर से दौड़-दौड़कर फूल तोड़ रही थी। उन सज्जन मकान मालिक ने आंगन की दीवार से लगी क्यारी में फेंसिंग लगा दी थी, फिर भी बच्ची ने छोटे हाथ अंदर डालकर गुलाब तोड़ लिए। कुछ अन्य ने ‘न बेटा’ कहते हुए अपनी आवाज उठाई लेकिन बच्ची मुस्कुराते हुए भाग गई। उस बच्ची ने किसी से भी फूल तोड़ने की अनुमति नहीं मांगी, जबकि अब वह अच्छे से बोलने लगी थी।

इससे मुझे सेवाग्राम के गांधी आश्रम में गुजरा मेरा बचपन याद आया। उस दौर में ज्यादातर घरों में जामुन, अमरूद और बेर के पेड़ होते थे। लेकिन आश्रम का अलिखित नियम यह था कि कोई भी बिना अनुमति कुछ नहीं तोड़ सकता। और याद रहे कि जमीन रहवासियों की नहीं होती थी क्योंकि पूरी जगह आश्रम की थी और वहां रहने वाले सभी लोगों का बराबर हक था। लेकिन उनके मुताबिक रहवासी ही उन पेड़ों को पानी देते हैं और फल देने की स्थिति तक पहुंचने में मदद करते हैं इसलिए फलों पर पहला अधिकार उनका होता था। हमारे घर के बाहर जामुन का पेड़ था।

अगर मेरी मां किसी बच्चे को उसके नीचे कुछ सेकंड खड़ा होकर जामुनों को निहारते देख लेती, तो वे उन्हें बरामदे में बुलातीं और कहतीं कि जितने जामुन खाना चाहो, खा लो। उस आश्रम के जीवन में एक महिला और बच्चों के बीच ऐसी मिलनसारिता थी।

दुर्भाग्य से आज के बच्चे फल तोड़ने का आनंद नहीं ले पाते क्योंकि इन दिनों इसमें झगड़ा होने की आशंका रहती है। लेकिन मुझे इस बात की कमी खलती है कि उन्हें अनुमति मांगना नहीं सिखाया जा रहा और जब बात देने की आती है तो हमारा दिल भी छोटा होता जा रहा है।

फंडा यह है पैरेंटिंग में थोड़ा-सा ‘गांधीवाद’ हमारे बच्चों को सिखाएगा कि उन्हें वे चीजें नहीं लेनी चाहिए, जो उनकी नहीं हैं। साथ ही वे सीखेंगे कि जो चीज जरूरत से ज्यादा है, उसे किसी को दे दो।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply