लंबे समय तक बने रहने वाले नतीजों के लिए निरंतर अपने योगदान के छोटे-छोटे डोज देते रहें

Management Funda By N. Raghuraman

पणजी से 21 किमी दूर, उत्तर गोवा में पर्यटन स्थल के रूप में मशहूर एक तटीय गांव है मांड्रेम। खूबसूरत पहाड़ियों के बीच पर्यटन के बल पर यह फल-फूल रहा है। इसमें दो प्रमुख बीच हैं- जूनस और अश्वेम। यह गांव शानदार पाम के पेड़ों, ताड़ी और काजू फेनी और फिशिंग के लिए जाना जाता है। किसी भी अन्य जगह की तरह, इस पर्यटन स्थल का भी बिजनेस के लिए पूरा दोहन किया गया।

तटीय इलाकों में पर्यटकों की लगातार बढ़ती भीड़ से स्थानीय लोगों, जिनमें ज्यादातर किसान परिवार हैं, को महसूस हुआ कि मौजूदा पीढ़ी उनके आसपास मौजूद औषधीय पौधों को नहीं पहचान पाती और न ही अब ये पौधे आसानी से उपलब्ध हैं। उन्हें यह भी लगा कि पुरानी पीढ़ी गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों के दौरान जो जंगली फल तोड़ती थे, वे भी अब वहां नहीं मिलते।

विद्या प्रबोधिनी कॉलेज के शिक्षक रुद्रेश महामल ने 2017 में सबसे पहले एनएसएस वॉलंटियर्स और अन्य स्थानीय लोगों की मदद से मांड्रेम पहाड़ी पर पौधरोपण का अभियान शुरू किया। हालांकि शुरुआत में उन्हें सफलता नहीं मिली क्योंकि वह अत्यधिक व्यवसायिकृत पर्यटन स्थल था। कई लोग शाम को वहां शराब पीने जाते और पौधे नष्ट हो जाते। लेकिन कुछ सालों में रुद्रेश को समझ आया कि अगर उन्हें परियोजना सफल बनानी है तो उन्हें समुदाय, पंचायत और गांव की जैव-विविधता प्रबंधन समिति के सहयोग की जरूरत होगी।

रुद्रेश के प्रोत्साहन की वजह से एक आदमी की पहल धीरे-धीरे पूरे गांव का सपना बन गई और सभी मांड्रेम की चोटी को फिर हरा-भरा देखना चाहते थे। पंचायत ने भी 2018 की ग्राम सभा में वहां पौधरोपण का प्रस्ताव पारित किया। चूंकि वह सरकारी जमीन थी इसलिए स्थानीय लोगों ने वन विभाग, जैव-

विविधता बोर्ड और गांव की जैव-विविधता प्रबंधन समिति के अधिकारियों को भी विश्वास में लिया। अब पिछले तीन साल से रुद्रेश के नेतृत्व में युवाओं का समूह हर रविवार की सुबह 8 से 11 बजे तक के लिए चोटी पर जाता है। शुरुआत के लिए 70 पौधे लगाकर उन्हें जनवरी से जून तक पानी दिया गया।

युवाओं को घास काटना भी सिखाया गया ताकि कोई सूखी घास जलाकर पौधों को नुकसान न पहुंचाए। धीरे-धीरे वे होशियार होते गए। चूंकि पहाड़ी 45 डिग्री के कोण पर है, इसलिए उन्होंने बारिश के पानी को रोककर सिंचाई में इस्तेमाल करने के लिए छोटे-छोटे गड्‌ढे खोदना शुरू किया। एक हिस्से में लगाए गए पौधे जब अपने बल पर बचे रहने लायक हो जाते हैं, तो समूह दूसरे हिस्से में चला जाता है। इसी साल ‘ट्री ऑफ होप चैलेंज’ के बैनर तले समूह ने1200 पौधे लगाए।

लेकिन अब भी रुद्रेश की रविवार की यात्रा बंद नहीं हुई है। कुछ रविवार उन्हें अकेले ही पौधे देखने जाना पड़ता है, लेकिन उन्होंने परंपरा नहीं छोड़ी है, भले उन्हें मदद मिले या नहीं। उनकी प्रतिबद्धता ने उस पूरे क्षेत्र में एक निरंतरता ला दी है, जिनके मन में समाज के हित और भावी पीढ़ी के लिए योगदान देने की कोई भी भावना है।

उनकी प्रतिबद्धता देखते हुए एक सरकारी निकाय ने तट पर वनस्पति बढ़ाने की परियोजना की निगरानी में उनसे मदद मांगी है, जिससे रेत के टीले बचाए जा सके। यहां तक कि सरकार ने भी महसूस किया है कि सतत निगरानी ही किसी पहल को जारी रखने और सफल बनाने का एकमात्र तरीका है।

फंडा यह है कि लंबे समय तक बने रहने वाले नतीजों के लिए निरंतर अपने योगदान के छोटे-छोटे डोज देते रहें।

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