फिल्मी विलेन का भी दिल बड़ा होता है, तभी तो वे बुरी परिस्थितियों में फंसे लोगों की मदद के लिए कदम बढ़ाते हैं

मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे की मेरी हालिया रोड ट्रिप में मैंने मेरे पीछे एक कार देखी, जिसमें हेडलाइट नहीं थी। अपने रिवर्स मिरर में मैंने देखा कि उसका ड्राइवर मेरी गति से चलने की कोशिश कर रहा था ताकि मेरी कार की हेड और टेल लाइट का फायदा उठा सके। लेकिन अचानक मैंने उस कार के टायर फटने की आवाज सुनी और जब तक मुझे इसका अहसास होता, मेरी कार 200 मीटर आगे निकल चुकी थी।

मैंने गाड़ी एक तरफ की और चाहा कि वापस जाऊं पर मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर ज्यादा ट्रैफिक में ऐसा संभव नहीं था। साथ ही एक्सप्रेस वे पर आसानी से गाड़ी रिवर्स नहीं कर सकते। मुझे उस व्यक्ति के लिए दु:ख हुआ क्योंकि गाड़ी में उसके साथ कोई बुजुर्ग भी था। अचानक मैंने देखा कि किसी फिल्म के विलेन की तरह दिख रहे एक हट्‌टे-कट्‌टे आदमी ने पंचर कार के पीछे अपनी कार रोकी और मास्क पहनकर उसके पास जाकर मदद की पेशकश की। उस आदमी की कार की तेज हेडलाइट में सब स्पष्ट दिख रहा था।

उसने कार से स्पेयर टायर निकाला, पंचर टायर बदला। फिर विलेन जैसा दिख रहा वह आदमी, पंचर कार वाले आदमी के पीछे चलता रहा और अपनी कार की हेडलाइट हाईबीम पर रख उसे गैराज तक का रास्ता दिखाया, जो 4 किमी की दूरी पर था। मैं भी विलेन जैसे दिख रहे आदमी के पीछे चलता रहा, यह सोचकर कि कहीं मेरी मदद की जरूरत न पड़े। और मैं देख सकता था कि उस आदमी की कार में तीन बच्चे और उनकी मां धैर्य के साथ बैठी थीं।

एक पल के लिए मैंने सोचा कि उन बच्चों के लिए सेवा और सहानुभूति सीखने के लिए ऐसे पिता से अच्छा रोल मॉडल कौन होगा, जो दिखने में काफी सख्त लग रहे हैं। मेरे हिसाब से इसे ही अपनी जीवनशैली परिभाषित करना कहते हैं। अपने जीवन को उस तरह से चलाना, जैसे आप चाहते हैं।

इस बड़े दिल वाले सख्त आदमी से मुझे संजीव थॉमस की याद दिलाई, जो केरल में पलक्कड़-कोझिकोड बायपास पर एक रेस्त्रां चलाते हैं। संजीव का ‘इतिहास’ नाम का 18 बसों का कारवां है, जिसमें पर्यटक और राज्य परिवहन (प्राइवेट) बसें शामिल हैं। लॉकडाउन के दौरान बसें बंद होने से इनपर काम करने वाले 30 लोगों की आजीविका प्रभावित हुई थी। उनकी अब कुछ राज्य परिवहन बसें चलने लगी हैं, लेकिन बाकी अभी बंद ही हैं। इसीलिए, 44 वर्षीय संजीव को लगा कि उन्हें अपने स्टाफ के लिए कुछ करना चाहिए।

लॉकडाउन के कुछ हफ्तों के दौरान उन्होंने अपने कुछ कर्मचारियों की बसों से आम बेचने में मदद की। ऐसा पूरे आम के मौसम में चला। उसके बाद संजीव ने सब्जी और किराना की दुकान खोली और उसमें स्टाफ के कुछ लोगों को काम दिया। ज्यादातर सब्जियां जिले के आस-पास के किसानों से सीधे ली जाती हैं। बाद में संजीव को ‘कट्‌टन्स’ नाम के एक रेस्त्रां का आइडिया आया, जिसमें उन्होंने कुक और टी-मास्टर के अलावा अपने दर्जनभर स्टाफ को काम पर लगाया।

यह शायद पहला रेस्त्रां है जिसे मलयालम फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं निभाने वाले मशहूर अदाकारों के कैरीकेचर से सजाया गया है। संजीव कुछ हटकर डिजाइन चाहते थे, इसीलिए वे रेस्रां को मलयालम सिनेमा के विलेन से सजाने के लिए प्रेरित हुए।

शायद उन्होंने यह न सोचा हो कि फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाने वाले लोगों का दिल बड़ा होता है। वे बुरी परिस्थितियों में फंसे लोगों की मदद के लिए कदम बढ़ाते हैं। सोनू सूद का ही उदाहरण ले लें, जिन्हें बॉलीवुड का बेहतरीन विलेन माना जाता है। वे पूरे लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरी की ट्रेन, बस और प्लेन से घर पहुंचने में मदद करने के लिए सुर्खियों में रहे थे।

फंडा यह है कि आपका लुक लोगों को कैसा भी लगे, लेकिन आपकी जीवनशैली आपके बारे में उनकी राय बदल देती है – एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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