‘रावण’ और देवी दोनों हमारे अंदर, एक को मारना और दूसरे को चुनना हमारे ही हाथ में

वह 10वीं तक ही पढ़ा है। दो दशकों से वह अपनी 30 बीघा जमीन पर खेती कर रहा है। उसे भी मौसम की मार और उत्पादों को बेचने जैसी समस्या थीं। चार साल पहले उसने अपने ‘रावण’ यानी ज्ञान की कमी को मारने का फैसला लिया। उसने जैविक खेती के सेमीनार में शामिल होना और महाराष्ट्र में बारामती, पुणे, नासिक और अमरावती के किसानों से मिलना शुरू किया।

मिलिए 35 वर्षीय अश्विन मठुकिया से, जिसने सीखा कि फायदा कमाने के लिए किसान को न सिर्फ अपनी फसल में मूल्य जोड़ना चाहिए, बल्कि एक अच्छा किसान होने के साथ खाद्य बाजार का सक्रिय सदस्य भी होना चाहिए। आप सोचेंगे कि कई लोग जैविक खेती करते हैं लेकिन उन्हें कम उपज की शिकायत रहती है। लेकिन राजकोट के पास के एक गांव के अश्विन ने अलग रास्ता अपनाया। उदाहरण के लिए अगर अगर सभी थोक बाजार में केला 10 रुपए किलो बेचते हैं, तो अश्विन ने सीधे बेचकर कीमत 20 रुपए प्रति किलो कर दी। फिर केले के चिप्स बनाकर 40 रुपए किलो में बेचे और केले का पाउडर बनाकर 80 रुपए किलो में बेचा।

यह सब करने के लिए उसने पहले दो लाख रुपए की सोलर ड्रायर, कटिंग मशीन, चक्की, आलू छीलने की मशीन, केले की चिप्स की मशीन और पैकिंग मशीनें आदि खरीदीं। अश्विन ने सोशल मीडिया के जरिए शॉर्ट फिल्म और वीडियो बनाकर गुजरात तथा महाराष्ट्र में 1000 ग्राहकों का बेस तैयार किया। वह उन्हें नियमित पार्सल भेजता है। एनआरआई ग्राहकों की मांग के लिए वह उनके भारतीय रिश्तेदारों के घर सामान पहुंचाता है। वह रोज औसतन 10 कुरियर भेजता है। अश्विन अकेला नहीं है, देशभर में ऐसे कई किसान हैं जो अपने ‘रावण’ को मारकर महामारी के दौर में ज्यादा पैसा कमा रहे हैं, जबकि शहरियों की नौकरी जा रही हैं और वे सोच रहे हैं कि संकट से कैसे उबरें। इस केस स्टडी को ही ले लें। मैं नहीं जानता कि कितने लोगों ने हमारे देश की आयात सूची पर ध्यान दिया है। लेकिन कुछ किसानों ने ऐसा किया है।

आयात सूची बताती है कि हमने 2018 में 8 करोड़ कीमत के 800 टन ड्रैगन फ्रूट आयात किए। लेकिन एक साल में ही, 2019 में यह आयात 10 हजार टन यानी 75 करोड़ रुपए का हो गया। और 2020 में यह और बढ़ रहा है, खासतौर पर महामारी के बाद क्योंकि लोग मानते हैं कि यह इम्यूनिटी बढ़ाता है।

खूबसूरत ड्रैगन फ्रूट बाहर से लाल और बैंगनी होता है और अंदर चितकबरा सफेद गूदा होता है। यह एंटीऑक्सीडैंट्स और पोटैशियम, आयरन, फॉसफोरस और कैल्शियम जैसे मिनरल्स से भरपूर है। इसमें शुगर कम होती है और सूजन व जलन में फायदेमंद है। इसकी कीमत 250-300 रुपए/किलो है। इसमें आश्चर्य नहीं कि डॉक्टर से किसान बने डॉ श्रीनिवास राव माधवरम जैसे लोग इसे सुपरफूड मानते हैं। हैदराबाद से 50 किमी दूर संगारेड्‌डी में उनका 30 एकड़ का खेत न सिर्फ नर्सरी है, बल्कि ड्रैगन फ्रूट के लिए रिसर्च लैब और खेत का काम भी करता है। डॉ श्रीनिवास ने ड्रैगन फ्रूट की उपज बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों की तकनीकों का अध्ययन कर उन्हें अपनाया।

वे फिलहाल इस फल का रस, पल्प, आइसक्रीम, जैम और सौंदर्य उत्पाद बनाने में प्रयोग को लेकर शोध कर रहे हैं। वे देशभर के 250 किसानों को भी सलाह दे रहे हैं, जिसमें ओडिशा सरकार भी शामिल है, जिसने राज्य में ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए जमीन देने में रुचि दिखाई है। वियतनाम ने यह फल निर्यात कर अपनी अर्थव्यवस्था पूरी तरह बदल ली है। यह इसकी अर्थव्यवस्था में एक अरब डॉलर का योगदान देता है। भारत में अभी 1250 हेक्टेयर में ड्रैगन फ्रूट उगाया जाता है, जिसकी 2025 तक 20 हजार हेक्टेयर होने की संभावना है।

फंडा यह है कि ‘रावण’ और देवी दोनों हमारे अंदर, एक को मारना और दूसरे को चुनना हमारे ही हाथ में है ।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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